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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 7, Verses 37–41

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 7, verses 37–41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 37-41

संस्कृत श्लोक

अहंतादिजगदृश्यं सर्वं ते मार्जयाम्यहम् । अत्यन्ताभावसंवित्त्या मनोमुकुरतो मलम् ॥ ३७ ॥ नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । यत्तु नास्ति स्वभावेन कः क्लेशस्तस्य मार्जने ॥ ३८ ॥ जगदादावनुत्पन्नं यच्चेदं दृश्यते ततम् । तत्स्वात्मन्येव विमले ब्रह्मचित्त्वात्स्वबृंहितम् ॥ ३९ ॥ जगन्नाम्ना न चोत्पन्नं न चास्ति न च दृश्यते । हेम्नीव कटकादित्वं किमेतन्मार्जने श्रमः ॥ ४० ॥ तथैतद्विस्तरेणाहं वक्ष्यामि बहुयुक्तिभिः । अबाधितं यथा तत्त्वं स्वयमेवानुभूयते ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

दूसरे प्रकार से भी दश्यके परिमार्जनकी प्रतिज्ञा करते है । हे श्रीरामजी, दृश्य के अत्यन्त अभावज्ञान से आपके मनरूपी दर्पण से मलरूपी दृश्य अहन्तादिरूप सम्पूर्ण जगत्‌ को परिमार्जित कर देता हूँ यानी पोंछ देता हू । असूत पदार्थ की सत्ता नहीं होती और सत्‌ का अभाव नहीं होता। जो वस्तु स्वभावतः नहीं है, उसके परिमार्जन मेँ कोनसा-क्लेश है ? जो यह विस्तृत जगत्‌ दिखाई देता है, यह पहले उत्पन्न नहीं हुआ है, यह चिन्मात्र होने के कारण निर्मल आत्मा में ही कल्पित हे, अत: ब्रह्मरूप ही है, उससे अतिरिक्त इसकी सत्ता नहीं हे । जगत्‌-नाम से न यह उत्पन्न हुआ है, न है ओर न दिखाई देता हे । जैसे सुवर्णं मेँ कल्पित कटकत्व आदि का सुवर्णदुष्टि से ही वाध हो जाता हे, वैसे ही ब्रह्म मेँ कल्पित इसका ब्रह्मदुष्टि से ही बाध हो जाता है । अतः इसके परिमार्जन में कौन-सा श्रम है ? मैं विविध युक्तयो द्वारा इस विषय को विस्तारपूर्वक इस तरह कहूँगा जैसे किं अबाधित तत्त्व आपको स्वयं ही अनुभूत हो जायेगा