Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 7, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 7, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

चिन्मात्रमेव शशिभृच्चिन्मात्रं गरुडेश्वरः । चिन्मात्रमेव तपनश्चिन्मात्रं कमलोद्भवः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

केवल कार्यात्मक विश्व ही उससे पृथक्‌ नहीं है, यह बात नहीं है, किन्तु विश्व की कारण माया भी, माया के गुणों के (सत्व, रज ओर तम के) अभिमानी ब्रह्मा, विष्णु, रद्र आदि देवताओं के साथ, उससे पृथक्‌ नहीं है, इस आशय से कहते है । चिन्मात्रस्वरूप यही महादेव है, चिन्मात्रस्वरूप यही विष्णु है, चिन्मात्रस्वरूप यही सूर्य है और चिन्मात्रस्वरूप यही चतुर्मुख ब्रह्मा है अर्थात्‌ उक्त चिन्मात्र से इनकी पृथक्‌ सत्ता नहीं है