Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 42
इकतालीसर्वौँ सर्ग समाप्त बयालीयसवाँ सर्ग अज्ञानावस्था में जगत् और स्वप्न की सत्यता का तथा वरदानपर्यन्त अवशिष्ट कथा का वर्णन।
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- Verse 1तत्त्वज्ञ की दष्ट से जगत् की असत्यता का विस्तार से वर्णन कर उसको दृढ़ करने के लिए अज्ञान…
- Verses 2–3असत् पदार्थ की अज्ञानी के प्रति अर्थ क्रियाकारिता कहाँ देखी गई है ? ऐसी जिज्ञासा होने पर…
- Verse 4जैसे प्राणियों की असत्य स्वप्नमृत्यु ही सत्यरूपिणी होकर अर्थक्रियाकारिणी शोक, रोदन आदि अर…
- Verses 5–6जिस पुरुष को कटक, कुण्डल आदि में अनुगत सुवर्ण का परिज्ञान नहीं है, उसको जैसे कनक के कटक म…
- Verse 7जैसे विकृतदृष्टिवालों को आकाश में मुक्तावली (मोतियों की माला), मोर पंख से और कुण्डलाकार क…
- Verses 8–10अहन्ता आदि से युक्त इस विश्व को दीर्घ स्वप्न समझो, यहाँ पर अपने से अतिरिक्त सत्य जन स्वप्…
- Verse 11जाग्रत में जैसे शास्त्रीय अर्थक्रिया के योग्य वह आविर्धूत हुआ, किन्तु स्वप्नमें वैसे अर्थ…
- Verse 12स्वप्न का विकास यानी सुषुम्नानाडी का छिद्र, उसके भीतर स्थित स्वप्नाध्यस्त विपुलाकाशमें पर…
- Verse 13स्वप्न और जाग्रत दोनों अवस्थाओं में भी आत्मा में नरता आदि के अवबोध में और अध्यस्त सत्यताव…
- Verse 14इस प्रकार स्वप्न और जाग्रत् के दश्यपदार्था परस्पर मिलित माया ओर उसके अधिष्ठानात्मक सत्य…
- Verse 15स्वप्नपदार्थ ब्रह्म के तुल्य वस्तुतः सत्य नहीं हैं, इतना ही कहा जा सकता है अधिष्ठानरहित ह…
- Verse 16स्वप्न यदि अत्यन्त असत् है, तो जाग्रत् प्रपंच के असत्त्व का निवारण नहीं हो सकेगा, क्योक…
- Verses 17–20इस प्रकार जगत् की स्वप्नतुल्यता और पूर्वोक्त सत्यता हुई, ऐसा कहते हैं। इस प्रकार यह विश्…
- Verse 21यदि ऐसा है, तो स्वप्नद्ृष्टा के जागने पर भी स्वप्न प्रपंच की जाग्रतृप्रपंच की नाई अवस्थित…
- Verse 22श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, जैसा आप कहते हैं, वह ठीक है, सत्यरूप होने से स्वप्नपत्तन स्वप…
- Verse 23अगर ऐसा है, तो जाग्रत-पदार्थ की नाई स्वप्नपदार्थों का भी अन्य स्वप्नो में व्यवहार संवाद ह…
- Verse 24इस प्रकार अधिष्ठानसत्ता से स्वप्न और जाग्रत् के सत्य होने पर भी सम्पूर्ण यानी जाग्रत् औ…
- Verse 25संवित् सम्पूर्ण यानी स्वप्न और जाग्रत् देश और काल की पूरक होने से सत्य है और मायाशक्ति…
- Verse 26जैसे कोश में जो धन रहता है, उसको उसका द्रष्टा अवश्य जानता है, वैसे ही चिदाकाश में सब कुछ…
- Verses 27–28तदुपरान्त देवी सरस्वती ने राजा विदूरथ को ज्ञानरूपी अमृत के सेंक से विवेक युक्त बनाकर उनसे…
- Verses 29–34श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीमान्, मधुर अक्षरों से युक्त वाणी से देवी सरस्वती से “तुम्हारे…