Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
स्वप्ने न पुरवास्तव्या वस्तुतः सत्यरूपिणः ।
प्रमाणमत्र शृणु मे प्रत्यक्षं नाम नेतरत् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्नपदार्थ ब्रह्म के तुल्य वस्तुतः सत्य नहीं हैं, इतना ही कहा जा सकता है अधिष्ठानरहित
होने के कारण अधिष्ठान सत्यता से सत्य नहीं होते, ऐसा नहीं कहा जा सकता है, क्योकि
प्रत्यक्ष प्रमाण से विरोध है, ऐसा श्रीवसिष्ठ जी कहते हैं ।
स्वप्न में स्वप्ननगरवासी लोग वस्तुतः सत्य नहीं हैं, इस विषय में प्रत्यक्ष प्रमाण को ही
मुझसे सुनो, अन्य प्रमाण को जानने की कोई आवश्यकता नहीं है । अत्यन्त असत् पदार्थ
वन्ध्यापुत्र आदि का प्रत्यक्ष नहीं होता, किन्तु स्वप्नपदार्थों का प्रत्यक्ष होता है, अतः वे अत्यन्त
असत् नहीं हैं