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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, Verse 16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

सर्गादावात्मभूर्भाति स्वप्नाभानुभवात्मकः । तत्संकल्पकलं विश्वमेव स्वप्नाभमेव तत् ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वप्न यदि अत्यन्त असत्‌ है, तो जाग्रत्‌ प्रपंच के असत्त्व का निवारण नहीं हो सकेगा, क्योकि वह भी तो हिरण्यगर्भ का स्वप्नरूप ही है, इस आशय से कहते हैं। सृष्टि के आदि में स्वयं प्रजापति स्वप्नसदृश आभास से सम्पन्न थे, वे ही अनुभवरूपी हिरण्यगर्भ है यानी संस्कारीभूत ज्ञान समष्टिरूपी है, अतएव उनके संकल्प से उत्पन्न हुआ यह विश्व भी स्वप्नसदृश है