Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, Verses 8–10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, verses 8–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 8-10
संस्कृत श्लोक
दीर्मस्वप्नमिदं विश्वं विद्ध्यहन्तादिसंयुतम् ।
अत्रान्ये स्वप्नपुरुषा यथा सत्यास्तथा शृणु ॥ ८ ॥
अस्ति सर्वगतं शान्तं परमार्थघनं शुचि ।
अचेत्यचिन्मात्रवपुः परमाकाशमाततम् ॥ ९ ॥
तत्सर्वगं सर्वशक्ति सर्वं सर्वात्मकं स्वयम् ।
यत्र यत्र यथोदेति तथास्ते तत्र तत्र वै ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
अहन्ता आदि से युक्त इस विश्व को दीर्घ स्वप्न समझो, यहाँ पर अपने से अतिरिक्त
सत्य जन स्वप्नदृष्ट अन्य पुरुषों के तुल्य हैं।
शंका - यदि ऐसा है, तो ये शास्त्र-प्रतिपादित याजन, प्रतिग्रह, उपदेश आदि
अर्थक्रियायोग्य सत्य हैं, ऐसा शास्त्र में क्यो स्वीकार किया गया है ?
समाधान - जैसे वे सत्य हैं, वैसा सूनो, कहते हैं- सर्वाधिष्ठान शान्त ओर निरतिशय
सत्य निर्मल अचेत्य-चिन्मात्र वपू सर्वत्र व्याप्त परमाकाश है। वह सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान,
सर्वात्मक स्वयं जहाँ-जहाँ जैसे-जैसे उदित होता है (जैसी अर्थक्रियाकारिता के योग्य
आविर्भूत होता है) वहाँ-वहाँ वैसे रहता हे