Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
यद्द्रष्टुश्चित्स्वरूपं तत्स्वप्नाकाशान्तरस्थितम् ।
स्वप्नाकाशचित्ताभं हि नरानामेति भावितम् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्न का विकास यानी सुषुम्नानाडी का छिद्र, उसके भीतर
स्थित स्वप्नाध्यस्त विपुलाकाशमें परिवर्तन और चित्तकी वासना के अनुसार तत्-तत् पदार्थों
के रूप से विवर्तता को प्राप्त हुआ द्रष्टा का जो चित् स्वरूप है, वही भावित होता हुआ "नर
यों नाम को प्राप्त हुआ है