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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, Verse 24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

एवं सर्वमिदं भाति न सत्यं सत्यवत्स्थितम् । रञ्जयत्यपि मिथ्यैव स्वप्नस्त्रीसुरतोपमम् ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार अधिष्ठानसत्ता से स्वप्न और जाग्रत्‌ के सत्य होने पर भी सम्पूर्ण यानी जाग्रत्‌ और स्वप्न देश तथा काल के पूरक न होने से स्वतः उनकी सत्यता नहीं है, इसलिए दोनों का मिथ्यात्व तुल्य है, ऐसा कहते हैं । इस प्रकार यह सब स्वप्न और जाग्रद्रूप प्रपंच सत्य नहीं हे, किन्तु अधिष्ठान सत्ता से सत्य सा प्रतीत होता है । स्वप्नस्त्रीसंगम की नाई मिथ्या ही अपने में आसक्ति कराकर जीव को मोहित करता है