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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । यस्त्वबुद्धमतिर्मूढो रूढो न वितते पदे । वज्रसारमिदं तस्य जगदस्त्यसदेव सत् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

तत्त्वज्ञ की दष्ट से जगत्‌ की असत्यता का विस्तार से वर्णन कर उसको दृढ़ करने के लिए अज्ञानियों की दुष्टि से उस्रकी अत्यन्त ढ़ सत्ता कहते है। जिस पुरुष की आत्मतत्त्व में दृढ व्युत्पत्ति नहीं हुई और बुद्धि में बोध का उदय नही हुआ उसके लिए यह जगत्‌ असत्‌ भी परमार्थ सत्‌ है; क्योकि लोक में जो अर्थ क्रियाकारी है, उसीकी सत्यरूप से प्रसिद्धि होती है, यह भाव हे

सर्ग सन्दर्भ

इकतालीसर्वौँ सर्ग समाप्त बयालीयसवाँ सर्ग अज्ञानावस्था में जगत्‌ और स्वप्न की सत्यता का तथा वरदानपर्यन्त अवशिष्ट कथा का वर्णन।