Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, Verses 17–20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, verses 17–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 17-20
संस्कृत श्लोक
एवं विश्वमिदं स्वप्नस्तत्र सत्यं भवान्मम ।
यथैव त्वं तथैवान्ये स्वप्ने स्वप्नवरा नृणाम् ॥ १७ ॥
स्वप्ने नगरवास्तव्याः सत्या न स्युरिमे यदि ।
तदिहापि तदाकारे न सत्यं मे मनागपि ॥ १८ ॥
यथाहं तव सत्यात्मा सत्यं सर्व भवेन्मम ।
स्वप्नोपलम्भे संसारे मिथः सिद्ध्यै प्रमेदृशी ॥ १९ ॥
संसारे विपुले स्वप्ने यथा सत्यमहं तव ।
यथा त्वमपि मे सत्यं सर्वं स्वप्नेष्विति क्रमः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार जगत् की स्वप्नतुल्यता और पूर्वोक्त सत्यता हुई, ऐसा कहते हैं।
इस प्रकार यह विश्व स्वप्न है, उसमें जैसे मेरी दृष्टि में आप सत्य हैं क्योंकि अपनी
सत्यता का आप अपलाप नहीं कर सकते, वैसे ही अन्य लोग भी आपकी दृष्टि और मेरी दृष्टि
से सत्य हैं, इसी प्रकार स्वप्न में अन्य मनुष्यों की भी अपने अपने अनुभव के अनुसार स्वप्न
सत्यता सिद्ध है। ये नगर और नगरवासी स्वप्न में यदि सत्य न हों, तो स्वप्नाकार इस जाग्रत्
में भी वे तनिक भी सत्य न होगे । तुम्हारी दृष्टि में मैं जैसे सत्यात्मा हूँ, मेरी दृष्टि में वैसे ही सब
सत्य हैं, स्वप्नसदृश संसारमें पदार्थो की परस्पर सिद्धि के लिए ऐसी प्रमा है । जैसे इस विपुल
स्वप्न रूपी संसारमें तुम्हारी दृष्टि में मैं सत्य हूँ और मेरी दृष्टि में तुम भी सत्य हो, वैसे ही सारे
स्वप्नों में क्रम हैं