Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
स्वप्नद्रष्टरि निर्निद्रे तद्द्रष्टुः स्वप्नपत्तनम् ।
सद्रूपत्वात्तथैवास्ते ममेति भगवन्मतिः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि ऐसा है, तो स्वप्नद्ृष्टा के जागने पर भी स्वप्न प्रपंच की जाग्रतृप्रपंच की नाई अवस्थिति
होगी ? ऐसी श्रीरामचन्द्रजी शंका करते हैं ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : मुनिवर, स्वप्नदृष्टा की नींद खुलने पर दृष्टा का वह स्वप्नपत्तन
सद्रूप होने से वैसा ही रहता है । आपके कथन से मेरी ऐसी धारणा हो गई है