Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, Verses 2–3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, verses 2–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 2,3
संस्कृत श्लोक
यथा बालस्य वेतालो मृतिपर्यन्तदुःखदः ।
असदेव सदाकारं तथा मूढमते जगत् ॥ २ ॥
ताप एव यथा वारि मृगाणां भ्रमकारणम् ।
असत्यमेव सत्याभं तथा मूढमतेर्जगत् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
असत् पदार्थ की अज्ञानी के प्रति अर्थ क्रियाकारिता कहाँ देखी गई है ? ऐसी जिज्ञासा
होने पर कहते है।
जैसे असत् वेताल भी बालक को मृत्यु पर्यन्त सब दुःखों का देनेवाला है, वैसे ही मूढमति
को सत् की नाई प्रतीत हो रहा यह असत् जगत् मूत्युपर्यन्त सब दुःखों का देनेवाला हे । जैसे
मरूभूमिस्थित सूर्य का प्रकाश ही अज्ञ मृगो की दृष्टि मेँ सत्यजलरूप से प्रतीत हुआ मृगो के
भ्रम का कारण होता है, वैसे ही असत्य ही यह जगत् मूढमतिकी दृष्टि में सत्य-सा प्रतीत होता
है