Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, Verses 5–6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, verses 5–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 5,6
संस्कृत श्लोक
अव्युत्पन्नस्य कनके कानके कटके यथा ।
कटकज्ञप्तिरेवास्ति न मनागपि हेमधीः ॥ ५ ॥
तथाऽज्ञस्य पुणुराजगनागेश्वमेखसुर् ।
इयं दृश्यदृगेवास्ति न त्वन्या परमाथदृक् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस पुरुष को कटक, कुण्डल आदि में अनुगत सुवर्ण का परिज्ञान नहीं है, उसको
जैसे कनक के कटक में कटक-ज्ञान ही होता है, सुवर्णज्ञान नहीं होता, वैसे ही अज्ञपुरुष की
नगर, गृह, पर्वत गजराज आदि से व्याप्त वह दृश्यदृष्टि ही है, अन्य परमार्थदृष्टि (सर्वानुगत
ब्रह्मदृष्टि) नहीं हे