Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, Verses 27–28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, verses 27–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 27,28
संस्कृत श्लोक
अनन्तरमुवाचेदं देवी ज्ञप्तिर्विदूरथम् ।
कृत्वा बोधामृतासेकैर्विवेकाङ्कुरसुन्दरम् ॥ २७ ॥
एतदेव मया राजँल्लीलार्थमुपवर्णितम् ।
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यावो दृष्टा दृष्टान्तदृष्टयः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
तदुपरान्त देवी सरस्वती ने राजा विदूरथ को ज्ञानरूपी अमृत के सेंक से विवेक युक्त
बनाकर उनसे यह कहा : राजन्, यह सब पूर्वोक्त तत्त्वज्ञान लीला की प्रीति के लिए ही मैंने
तुमसे कहा । तुम्हारे इच्छित पदार्थ की सिद्धि हो, लीला ने पूर्वोक्त जगन्मिथ्यात्व की
दृष्टान्तभूता मण्डप के अन्दर तुम्हारी ब्रह्माण्डकल्पनारूपी दृष्टियाँ देख ली हैं