Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 34
तैंतीसवाँ सर्ग समाप्त चोंतीसवाँ सर्ग संग्राम दर्शकों के मुँह से प्रकारान्तर से पुनः युद्ध के ही चमत्कार का वर्णन ।
36 verse-groups
- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, वहाँ युद्ध लिप्त राजाओं, युद्धेच्छु योद्धाओं,…
- Verse 2जिसमें हंस, सारस आदि पक्षी उड़ रहे हैं और कमल हिल रहे हैं ऐसे तालाब के समान शूरवीर पुरुषो…
- Verse 3देखिये, रुधिरबिन्दुओं की राशिरूपी सिन्दूर से लाल हुए वायु के कारण ये मेघ और सूर्य किरण मध…
- Verse 4कोई दर्शक दूर से बाणसमुदाय पराल की भांति होने से पूछता है । भगवन्, यह आकाश परालराशि से प…
- Verses 5–6रुधिर से पृथिवी में जितने रणरेणू (रणभूमि के धूलिकण) सींचे जाते हैं, उतने हजार वर्षो तक यो…
- Verse 7वीर पुरुषों का आलिंगन करने के लिए सस्पृह सुरांगनाओं के जघनस्थल में स्थित मेखलाओं को शिथिल…
- Verses 8–9सुन्दर भुजलताओं से मनोहर, लाल पल्लवो के सदृश कोमल हाथों से युक्त, पारिजात आदि, पुष्पमंजरि…
- Verses 10–11प्रतिपक्षी सेना को काट रही हे । खेद है, मेरे पिताजी का देदीप्यमान कुण्डल से युक्त सिर भाल…
- Verses 12–13पैरों तक लटकी हुई जंजीर में गूथ हुए दो बड़े बड़े पत्थरों से युक्त चित्र दण्डनामक चक्र को…
- Verse 14देखिये, तुरन्त कटे हुए कण्ठच्छिद्रों में डुबकी लगा रहे सफेद चीलों से व्याप्त, युद्ध के बा…
- Verse 15देवगणों की गोष्ठियों में परस्पर यह चर्चा चली थी कि कौन धीर पुरूष, कब, कैसे और किसलिए स्वर…
- Verse 16अहो, यह विक्रान्त योद्धा, जैसे सागर मत्स्य और मगर के समूहों से युक्त नदियों को निगल जाता…
- Verse 17हाथियों के गण्डस्थलोमें बिखरे हुए धाराकार बाणों की पंक्तियाँ पर्वतों के शिखरों पर गिरी हु…
- Verses 18–19हा, भाले ने मेरा सिर काटा, ऐसा कहने की इच्छा कर रहे मेरे कट कर उड़े हुए सिर ने स्वर्गारोह…
- Verse 20पहले की पत्नी अप्सरा बन कर रणभूमिमें मारे गये पति को वलीपलित से निर्मुक्त यानी देवभूत जान…
- Verse 21भालों के समूहों की प्रभाएँ मानों वीरों के स्वर्ग में चढ़ने के लिए बनाई गई स्वर्ग पर्यन्त…
- Verses 22–26जो योद्धा की पत्नी स्वतः सुन्दर और स्वर्णाभरणों से सुन्दर पति के वक्षःस्थल में मरी हुई दे…
- Verses 27–28विविध आयुधों की चोट लगने से ट्टी हुईं असंख्य बड़ी-बड़ी हड्डियाँ, जो कि कणत्कार से (कण-कण…
- Verses 29–31ग्रहों के मार्ग में घूमनेवाले राजाओं के सिरोंने आकाशको जिसमें बह रहे वायु से कमल चंचल हैं…
- Verse 32जैसे पर्वतो में पिपीलिकाएँ लीन हो जाती हैं तथा जैसे पुरुषों के वक्षस्थलों में स्त्रियाँ ल…
- Verse 33उड़ रहे आकाश में स्थित छत्रों ने मानों चन्द्रमा का सम्पादन किया, यशरूप मूर्ति से चन्द्रमा…
- Verse 34जैसे सोया हुआ पुरुष एक निमेष में स्वप्ननगर को प्राप्त होता है, वैसे ही योद्धा भी मरणकाली…
- Verse 35आकाशरूपी सागर मेँ त्रिशूल, शक्ति, तलवार ओर चक्रों की व्यग्र वृष्टियाँ मछलियों ओर मगरो से…
- Verses 36–38बाणो से काने गये सफेद छत्ररूपी कलहंस से आकाशस्थल संचित लाखों पूर्णेन्दु-विम्बों से आवृत स…
- Verse 39हे कुशलिन्, जैसे फलने के लिए तैयार धानो की शोभा को आकाशमें उड़ रहे टिड्डियों का दल नष्ट…
- Verse 40कठिन कवच से उत्पन्न हुई यह भूजदण्डों को फैलाये हुए योद्धा के तलवार की वार की ध्वनि ही मान…
- Verse 41इस जनक्षय के अवसर मेँ तलवार आदि अस्त्र-शस्त्र रूपी प्रलयकाल के वायु से परास्त, दाँतरूपी झ…
- Verses 42–43हा, खेद है, रुधिर के महान् तालाब में चक्र, रथारोही वीर, सारथि ओर घोड़ो से युक्त तथा शस्त…
- Verse 44मनुष्य, हाथी, घोडे ओर गदहों से जो खून के झरने निकले उनके विन्दुओं से सराबोर वायु से लाल ह…
- Verse 45समुदाय की माला प्रादुर्भूत हुई है
- Verses 46–47असंख्य, रुधिर से लथपथ, टूटे-फूटे भूखण्डों और अस्त्र-शस्त्रो से व्याप्त भुवन अग्निलोक की न…
- Verses 48–49हटने में असमर्थ अनेक योद्धाओं मेँ एक शूरवीर द्वारा अतिशय हस्तलाघव से प्रहार करने के कारण…
- Verse 50कटे हुए छाते ही जिसमें तरंग से प्रतीत हो रहे हैं, ऐसा परस्परयुद्ध में प्रयुक्त अस्त्र-शस्…
- Verse 51जिसने मधुर फैलनेवाले ओर तुरही आदि बाजों की प्रतिध्वनियों से वेग के साथ लोकपालों के लोक को…
- Verse 52बड़े खेद की बात है, अत्यन्त कठिन कवचों को बिना तोड़े ही कवचों में उनके टकराने से आकाश में…
- Verse 53हे मित्र, युद्ध से हुई थकावट से आपकी युद्धेच्छा शान्त हो गई है, अतः आपसे मैं निर्दोष हित…