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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, Verse 53

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, verse 53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 53

संस्कृत श्लोक

छिन्नेच्छाच्छमिति न यावदङ्गभङ्गं कुर्वन्तो ज्वलदनलोज्ज्वलाः पृषत्काः । तावद्द्राग्द्रुतमित एहि मित्र यामो यामोऽयं प्रवहति वासरश्चतुर्थः ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ

हे मित्र, युद्ध से हुई थकावट से आपकी युद्धेच्छा शान्त हो गई है, अतः आपसे मैं निर्दोष हित की बात करता हूँ उसे सुनिए जब तक जल रही अग्नि से उज्ज्वल बाण हम लोगों के अंगो को भंग नहीं करते, तब तक चलो, शीघ्र दौड़कर इधर से चले जायें, क्योंकि यह चौथा प्रहर यम का ही दिन हे