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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, Verse 32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

अपूर्वोत्तमसौन्दर्यकान्तसंगमशंसिनः । वान्ति विद्याधरस्त्रीणामलकोल्लासिनोऽनिलाः ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे पर्वतो में पिपीलिकाएँ लीन हो जाती हैं तथा जैसे पुरुषों के वक्षस्थलों में स्त्रियाँ लीन हो जाती हैं, वैसे ही मरे हुए हाथियों के ढेर में डरपोक लोग लीन होते हैं ॥३ १॥ विद्याधरों की अंगनाओं के अलकों को अनुकूलरूप से हिलानेवाले अतएव अभूतपूर्व उत्तम सौन्दर्य से सम्पन्न कान्त के मिलन के सूचक मन्द मन्द वायु बहते हैं । भाव यह कि वायु घर से आ रही विद्याधरों की अंगनाओं के अलकों को उल्लासित करने के कारण अनुकूल होने से शकुनरूप हैं। अतएव मनोरथसिद्धि के सूचक हैं