Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, Verses 18–19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, verses 18–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 18,19
संस्कृत श्लोक
हा कुन्तेन शिरो नीतं ममेत्येव विवक्षतः ।
शिरसाऽजीवमित्येवं खे खगेनेव वाशितम् ॥ १८ ॥
यन्त्रपाषाणवर्षेण यैषास्मान्परिषिञ्चति ।
सेनानुशृङ्खलाजालवलना क्रियतां बलात् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
हा, भाले ने मेरा सिर काटा, ऐसा
कहने की इच्छा कर रहे मेरे कट कर उड़े हुए सिर ने स्वर्गारोहण के उत्सव को देखने से मैं
जी गया न कि मरा, यों हर्षपूर्वक जो आकाश में वचन कहा, उसे पक्षी के विरूत की नाई
लोगों ने सुना । जो यह सेना क्षेपणीयन्त्रसे निकले हुए पत्थरों की वृष्टि से हमें सींचती है,
उसे जंजीरों के जाल से जबरदस्ती बाँध दो, ऐसा एक योद्धा दूसरे योद्धा से कहता
था