Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, Verses 48–49
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, verses 48–49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 48,49
संस्कृत श्लोक
अक्षोभैकप्रहरणाद्यातुधान्योऽन्यचेष्टितम् ।
संरम्भावेक्षणप्रज्ञं रणं स्वप्नमिव स्थितम् ॥ ४८ ॥
अनन्यशब्दाविरतहताहतिरणज्झणैः ।
गायतीव क्षतक्षोभमुदितो रणभैरवः ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
हटने में असमर्थ अनेक योद्धाओं मेँ एक शूरवीर
द्वारा अतिशय हस्तलाघव से प्रहार करने के कारण जिसमें राक्षसो की माया के तुल्य शूरों
की चेष्टाएँ हैं, क्रोध से निरीक्षण करनेवाली योद्धाओं की बुद्धि है, ऐसे रण को स्वप्न के समान
सामने देखता हू । स्वप्न पक्ष विनाश के अनुकूल छेदन, भेदन, संचलन आदि से रहित
स्वाप्निक पदार्थो मेँ एकमात्र जागरण से प्रहार किया जाता है यानी बाधा पहुँचाई जाती है,
इसलिए वह राक्षसो की माया के तुल्य मिथ्या है ओर उसमें आत्मप्रज्ञा अवेश से दर्शन करती
हे । घायल योद्धाओं के क्षोभ से प्रसन्न हुआ रणभेरव अन्यान्य शब्दों के संमिश्रण से रहित
निरन्तर अन्योन्य के प्रहार से उत्पन्न झंकारों से मानों गायन करता है