Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, Verses 36–38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, verses 36–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 36-38
संस्कृत श्लोक
शरोत्कृत्तसितच्छत्रकलहंसैर्नभःस्थलम् ।
भाति संचितपूर्णेन्दुबिम्बलक्षैरिवावृतम् ॥ ३६ ॥
क्रियते गगनोड्डीनैश्चामरैश्चारुघर्घरैः ।
वातावधूतसंरोधतरङ्गनिकरद्युतिः ॥ ३७ ॥
दृश्यन्ते हेतिदलिताश्छत्रचामरकेतवः ।
आकाशक्षेत्रविक्षिप्ता यशःशालिलता इव ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
बाणो से काने गये सफेद छत्ररूपी कलहंस से आकाशस्थल संचित लाखों
पूर्णेन्दु-विम्बों से आवृत सा प्रतीत होता हे । आकाश में उड़े हुए सुन्दर घर-घर शब्द करने
वाले चँवरो से आकाश वायु के वेग से जिनकी स्थिरता क्षुब्ध हो गई हो, ऐसे तरगों के समूह
की कान्तिवाला बनाया जा रहा है । अस्त्र-शस्त्रों से काटे गये तथा आकाशरूपी खेत में
फेंके गये छाते, चँवर और पताका-वृन्द यशरूपी धानो के पेड़ों की नाई दिखाई देते
है