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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, Verses 42–43

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, verses 42–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 42,43

संस्कृत श्लोक

सचक्रनाथसूताश्वं व्यूढं रक्तमहाहृदे । हाहाभिभूतगतिकं चेष्टते रथपत्त्नम् ॥ ४२ ॥ करकंकटकुट्यङ्कखड्गसंघट्टटांकृतैः । कालरात्र्या प्रनृत्यन्त्या रणवीणेव वाद्यते ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

हा, खेद है, रुधिर के महान्‌ तालाब में चक्र, रथारोही वीर, सारथि ओर घोड़ो से युक्त तथा शस्त्रास्त्र से परिपूर्ण रथरूपी नगर रुद्धगति होकर छटपटा रहा है | नाच रही कालरात्रि, वीरोँ की भुजाओं, हाथियों की सूँड़ों और कवचरूपी वीणा के तारों में तलवार के आघात से उत्पन्न वादनशब्दों से मानों वीणा बजाती है