Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, Verses 5–6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, verses 5–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 5,6
संस्कृत श्लोक
यावन्तो भुवि सिच्यन्ते रुधिरे रणरेणवः ।
तावन्त्यब्दसहस्राणि भटानामास्पदं दिवि ॥ ५ ॥
मा भैष्ट नैते निस्त्रिंशा नीलोत्पलदलत्विषः ।
अमी वीरावलोकिन्या लक्ष्म्या नयनविभ्रमाः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
रुधिर से पृथिवी में जितने रणरेणू (रणभूमि
के धूलिकण) सींचे जाते हैं, उतने हजार वर्षो तक योद्धाओं का स्वर्ग में आवास होता है।
भाई, मत डरो, नील कमल की पंखुड़ी के तुल्य कान्तिवाली ये तलवारें नहीं हैं, ये वीरों के
निरीक्षण करनेवाली जयलक्ष्मी के नेत्रविभ्रम हैं