Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, Verse 52
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
हा हा धिक्प्रविकटकङ्कटाननोद्यत्प्रोड्डीनप्रकटतडिच्छटाप्रतप्ताः ।
क्रेङ्कारस्फुरितगुणेरिता रणन्तो नाराचाः शिखरिशिलागणं वहन्ति ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
बड़े
खेद की बात है, अत्यन्त कठिन कवचों को बिना तोड़े ही कवचों में उनके टकराने से आकाश
में उड़ी हुई बिजली के सदृश अग्नि की ज्वालाओं से तपे हुए बाण जो कि क्रेंकार ध्वनि के
साथ विस्तारित प्रत्यंचा से छोड़े गये हैं, अतएव शब्द कर रहे हैं, समीपवर्ती पर्वत की शिलाओं
को छेदकर धारण करते हैं । कठिन कवचों पर निष्फल हुए अपने प्रबल बाणों के लिए शोक
कर रहे वीरों की यह उक्ति है