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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, Verses 29–31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, verses 29–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 29,30

संस्कृत श्लोक

भ्रमद्भिर्ग्रहमार्गेषु शिरोभिर्वीरभूभृताम् । आयुधांशुलतानाललग्नासिदलकण्टकैः ॥ २९ ॥ केतुपट्टंमृणालाङ्गदलैर्लब्धशिलीमुखैः । वहद्वातचलत्पद्मं नभः पद्मसरः कृतम् ॥ ३० ॥ मृतमातङ्गसंघाते गिराविव पिपीलिकाः । भीरवः परिलीयन्ते स्त्रियः पुंवक्षसीव च ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

ग्रहों के मार्ग में घूमनेवाले राजाओं के सिरोंने आकाशको जिसमें बह रहे वायु से कमल चंचल हैं, ऐसा कमलों का तालाब बना दिया है । देखिए न, अस्त्र-शस्त्रों की किरणें ही उक्त सिररूपी कमलों की लताओं के नालदण्ड है, उनसे लगी हुई तलवारें उनके पत्ते हैं, त्रिशूल, भाले आदि उनके कटि हैं, पताकाओं के वस्त्र उनके मृणालों के अंगभूत बड़े पत्ते हैं और बाणरूपी भँवरे उनमें लगे हैं