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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 2

22 verse-groups

  1. Verse 1पहला सर्गे समाप्त दूसरा सर्ग॑ भौतिक देह को आत्मा समझनेवाला अज्ञानी मृत्यु का भोजन है, तत्…
  2. Verses 2–8नगर में उसे मारने के लिए गया । कोई भी समर्थ पुरुष अपना कर्म करने के लिए उद्यमका त्याग नही…
  3. Verse 9तदुपरान्त मृत्यु ने संशय को दूर करनेवाले यमराज के पास जाकर उनसे पूछा : हे विभो, मैं आकाशज…
  4. Verses 10–11यमराज ने कहा : हे मृत्यो तुम अकेले अपने बल से किसी को मारने में समर्थ नहीं हो जिसको तुम म…
  5. Verses 12–16तदनन्तर मृत्यु उसके कर्मो को खोजने के लिए तत्पर होकर सम्पूर्ण देशों, दिगन्तं, तालाबों, नद…
  6. Verse 17मृत्यु ने कहा : प्रभो, आकाशज विप्र के कर्म कहाँ हैं, यह बात आप मुझसे कहिए । मृत्यु के यों…
  7. Verses 18–21धर्मराज ने कहा : हे मृत्यो, आकाशज के कोई भी (८) कर्म नहीं है, यह आकाशज विप्र केवल आकाश से…
  8. Verses 22–23यदि शंका हो कि कायिक कर्म भले ही न हों, पर मानसिक कर्म तो उसके होंगे ही ? इस पर कहते हैं।…
  9. Verse 24ऐसे होने पर यह पख्रह्मस्वभाव से ही स्थित है, दृश्यस्वभाव यह नहीं है, ऐसा कहते हैं। इस प्र…
  10. Verse 25यदि कोड कहे कि यदि यह कुछ भी कर्म नहीं करता, तो हम लोगों को यह प्राण क्रिया से युक्त एवं…
  11. Verse 26तो उसको यह मेरा देह है, इत्यादि बुद्धि कैसे होती ? इस पर कहते हैं। चैतन्यरूप स्तम्भ में च…
  12. Verses 27–34जैसे जल में द्रवत्व (तरलता) है, जैसे आकाश में शून्यता है और जैसे वायुमें स्पन्दता (गति) ह…
  13. Verse 35यदि शंका हो कि अन्य जीव भी तो इसके व्यष्टिरूप ही हैं, फिर वे कैसे मृत्यु से गृहीत होते है…
  14. Verses 36–38आदि और अन्त मे तन्मात्रा का (प्रकाशात्मक विज्ञानमात्र का) परिशेष रहने से वही इसका स्वाभाव…
  15. Verses 39–41ऐसी परिस्थिति में अन्य की दृष्टि से अध्यस्त देह आदि से इसकी निर्विकल्पताकी क्षति नहीं है,…
  16. Verse 42चित्‌ की बहिमुख प्रवृत्ति वेदना है । वेदनामात्र की सर्वथा शान्ति होने पर प्रातिभासिकरूपवा…
  17. Verses 43–45जहाँ पर चित्स्वभाव वेदनाओं का सहन नहीं होता, वहाँ पर पृथिवी आदि के सहन की संभावना कैसे हो…
  18. Verse 46आकाशज ब्राह्मण इस दूसरे नाम से उक्त ब्रह्मा ही इस आख्यायिका से दर्शाया गया है और जगत्‌ मि…
  19. Verses 47–49मृत्यु ने ऐसे विषय में, जिसमें उसकी शक्ति काम नहीं कर सकती थी, क्यों उद्योग किया ? इस शंक…
  20. Verses 50–54जो चिदाकाश के समान चमत्कारवाला और चिदाकाश के समान अनुभव स्वरूप है, वह चिदाकाश ही है, उसमे…
  21. Verse 55संकल्पित चित्रप्रतिमा देहरहित होती हुई भी चित्रप्रतिमा के आकार से भासित होती है, वैसे ही…
  22. Verse 56मन का स्वयम्भू के आकार में परिणाम वास्तविक नहीं है, किन्तु शुद्ध ब्रह्म ही अज्ञान से उस प…