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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, Verses 36–38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, verses 36–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 36-38

संस्कृत श्लोक

महाप्रलयसंपत्तौ न किंचिदवशिष्यते । ब्रह्मास्ते शान्तमजरमनन्तात्मैव केवलम् ॥ ३६ ॥ शून्यं नित्योदितं सूक्ष्मं निरुपाधि परं स्थितम् । तदा तदनु येनास्य निकटेऽद्रिनिभं महः ॥ ३७ ॥ संविन्मात्रस्वभावत्वाद्देहोऽहमिति चेतति । काकतालीयवद्भ्रान्तमाकारं तेन पश्यति ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

आदि और अन्त मे तन्मात्रा का (प्रकाशात्मक विज्ञानमात्र का) परिशेष रहने से वही इसका स्वाभाविक सत्य रूप है, इस आशय से कहते हैं। महाप्रलय होने पर कुछ भी अवशिष्ट नहीं रहता, उस समय केवल शान्त जरारहित, अनन्तस्वरूप, शून्य, नित्य उदित, सूक्ष्म, उपाधिशून्य परब्रह्म ही स्थित रहता है। तदुपरान्त सृष्टि के आरम्भकालमें वासना ओर अदृष्ट से परिपूर्ण जीवकी अविद्या से, इसके विज्ञानमात्र होनेसे, इसके निकट विषयभावसे पर्वततुल्य (पर्वत के समान जिसका निवारण नहीं हो सकता) विराट्रूप या चतुर्मुखरूप देह इस नाम से कथन के योग्य स्थूलरूप कुछ स्फुरित होता है, उस समय उक्त अविद्या से ही हम लोग काकतालीयके समान अकस्मात्‌ स्वप्न की नाई मिथ्याभूत उस आकारको देखते हैं