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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, Verses 12–16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, verses 12–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 12-16

संस्कृत श्लोक

ततः स मृत्युर्बभ्राम तत्कर्मान्वेषणादृतः । मण्डलानि दिगन्तांश्च सरांसि सरितो दिशः ॥ १२ ॥ वनजङ्गलजालानि शैलानब्धितटानि च । द्वीपान्तराण्यरण्यानि नगराणि पुराणि च ॥ १३ ॥ ग्रामाण्यखिलराष्ट्राणि देशान्तर्गहनानि च । एवं भूमण्डलं भ्रान्त्वा न कुतश्चित्स कानिचित् ॥ १४ ॥ तान्याकाशजकर्माणि लब्धवान्मृत्युरुद्यतः । वन्ध्यापुत्रमिव प्राज्ञः संकल्पाद्रिमिवापरः ॥ १५ ॥ समपृच्छदथागत्य यमं सर्वार्थकोविदम् । परायणं हि प्रभवः संदेहेष्वनुजीविनाम् ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर मृत्यु उसके कर्मो को खोजने के लिए तत्पर होकर सम्पूर्ण देशों, दिगन्तं, तालाबों, नदियों, दिशाओं, वनों, जंगलों, पर्वतो, समुद्रतटों, अन्यान्य द्वीपो, अरण्यों, नगरों, कस्वों, ग्रामो, सम्पूर्ण राष्ट्रों एवं रेगिस्तानोंमें घूमा अर्थात्‌ किस देश में इसने पहले क्या कर्म किया, उसे ध्यानपूर्वक जानना अधिक यत्नसाध्य होने से तत्‌-तत्‌ स्थानों में घूमा, केवल देश घूमने के लिए नहीं घूमा । इस प्रकार सम्पूर्ण भूमण्डल में घूमकर उद्यमी मृत्युने आकाशज विप्र के कोई भी मारक कर्म कहीं भी नहीं पाये जैसे कि वन्ध्यापुत्रको प्राज्ञ तथा कल्पित पर्वत को कल्पना करनेवाले पुरुष से अन्य पुरुष नहीं पा सकता । अनन्तर सम्पूर्ण अर्थो को जाननेवाले यमराज के पास आकर मृत्यु ने उनसे पूछा, क्योंकि सेवकों को सन्देह उपस्थित होने पर उनके प्रभु ही आश्रय होते हँ