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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, Verses 47–49

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, verses 47–49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 47-49

संस्कृत श्लोक

मन्वन्तरे सर्वभक्षो यदा मृत्युर्हरन्प्रजाः । बलमेत्यब्जजाक्रान्तावारम्भमकरोत्स्वयम् ॥ ४७ ॥ तदैव धर्मराजेन यमेनाश्वनुशासितः । यदेव क्रियते नित्यं रतिस्तत्रैव जायते ॥ ४८ ॥ ब्रह्मा किल पराकाशवपुराक्रम्यते कथम् । मनोमात्रं च संकल्पः पृथ्व्यादिरहिताकृतिः ॥ ४९ ॥

हिन्दी अर्थ

मृत्यु ने ऐसे विषय में, जिसमें उसकी शक्ति काम नहीं कर सकती थी, क्यों उद्योग किया ? इस शंका पर व्यसनिता के कारण ही उसने उद्योग किया, ऐसा कहते हैं। जो पुरूष नित्य जिस कामको करता है, उसीमें उसकी प्रीति होती है । ब्रह्मा चिदाकाशस्वरूप, संकल्पशरीर और पृथ्वी आदि से रहित मूर्तिवाला है, उसका शरीर मनोमात्र है, भला उस पर आक्रमण ही कैसे हो सकता है ?