Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, Verses 2–8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, verses 2–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 2-8
संस्कृत श्लोक
अस्ति ह्याकाशजो नाम द्विजः परमधार्मिकः ।
ध्यानैकनिष्ठः सततं प्रजानां च हिते रतः ॥ २ ॥
स चिरं जीवति यदा तदा मृत्युरचिन्तयत् ।
सर्वाण्येव क्रमेणाह भूतान्यद्मि किलाक्षयः ॥ ३ ॥
एनमाकाशजं विप्रं न कस्माद्भक्षयाम्यहम् ।
अत्र मे कुण्ठिता शक्तिः खङ्गधारा इवोपले ॥ ४ ॥
इति संचिन्त्य तं हन्तुमगच्छत्तत्पुरं तदा ।
त्यजन्त्युद्यममुद्युक्ता न स्वकर्माणि केचन ॥ ५ ॥
ततस्तत्सदनं यावन्मृत्युः प्रविशति स्वयम् ।
तावदेनं दहत्यग्निः कल्पान्तज्वलनोपमः ॥ ६ ॥
अग्निज्वालामहामालां विदार्यान्तर्गतो ह्यसौ ।
द्विजं दृष्ट्वा समादातुं हस्तेनैच्छत्प्रयत्नतः ॥ ७ ॥
नचाशकत्पुरो दृष्टमपि हस्तशतैर्द्विजम् ।
बलवानप्यवष्टब्धुं संकल्पपुरुषं यथा ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
नगर में उसे मारने के लिए गया । कोई भी समर्थ पुरुष अपना कर्म करने के लिए उद्यमका त्याग
नहीं करते । उसके अनन्तर मृत्यु आकाशज विप्र के घरमें ज्यों ही स्वयं प्रविष्ट हुआ त्यों ही
समाधि में उपस्थित होनेवाले विघ्नो को हटाने के लिए ब्रह्मा द्वारा प्रकाशरूप से स्थापित
प्रलयाग्नि के तुल्य अग्नि मृत्यु को जलाने लगी । मृत्यु अग्नि की ज्वालाओं की परम्परा को
चीरकर भीतर गया । उसने ब्राह्मण को देखकर यत्नपूर्वक उसे हाथ से पकड़ने की इच्छा की ।
जैसे बलवान् पुरुष भी संकल्प से कल्पित पुरुष को छूने में समर्थ नहीं होता, वैसे ही सामने
विद्यमान उस ब्राह्मण को वह अपने सैकड़ों हाथों से भी पकड़ने में समर्थ नहीं हुआ