Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, Verses 18–21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, verses 18–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 18-21
संस्कृत श्लोक
धर्मराज उवाच ।
आकाशजस्य कर्माणि मृत्यो सन्ति न कानिचित् ।
एष आकाशजो विप्रो जातः खादेव केवलात् ॥ १८ ॥
आकाशादेव यो जातः स व्योमैवामलं भवेत् ।
सहकारीणि नो सन्ति न कर्माण्यस्य कानिचित् ॥ १९ ॥
संबन्धः प्राक्तनेनास्य न मनागपि कर्मणा ।
अस्ति वन्ध्यासुतस्येव तथाऽजाताकृतेरिव ॥ २० ॥
कारणानामभावेन तस्मादाकाशमेव सः ।
नैतस्य पूर्वकर्मास्ति नभसीव महाद्रुमः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
धर्मराज ने कहा : हे मृत्यो, आकाशज के कोई भी (८) कर्म नहीं है, यह आकाशज विप्र
केवल आकाश से ही उत्पन्न हुआ है । आकाश से जो उत्पन्न हुआ है, वह आकाश के समान
निर्मल है । इसके मारण में मृत्यु की सहायता करनेवाले कोई कर्म (५६) ही नहीं हे । जैसे
वन्ध्या के पुत्र का ओर जैसे जिसका आकार उत्पन्न ही नहीं हुआ, उसका प्राक्तन कर्म से
कोई सम्बन्ध नहीं रहता, वैसे ही इस आकाशज विप्रका प्राक्तन कर्म से तनिक भी सम्बन्ध
नहीं हे । अविद्या आदि कारणों का या निर्विकार तत्त्वके विकार के हेतुओं का अभाव होने से
विकार का सम्बन्ध न होने के कारण वह आकाशरूप ही हे । जैसे आकाश में महान् वृक्षका
& प्रारब्ध से प्राप्त फलों का उपभोग से ही क्षय होने, संचितो का ज्ञान से क्षय होने तथा आगामी
कर्मो का बीज के अभाव से क्षय होने से कर्म ही नहीं हैं यह भाव है ।
६ अथवा अभिमान, राग आदि अद्यतन कर्म, यह अर्थ है।
अस्तित्व नहीं है, वैसे इसके पूर्व कर्मों का भी संभव नहीं है