Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, Verses 39–41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, verses 39–41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 39-41
संस्कृत श्लोक
स एष ब्राह्मणस्तस्मिन्सर्गादावम्बरोदरे ।
निर्विकल्पश्चिदाकाशरूपमास्थाय संस्थितः ॥ ३९ ॥
नास्य देहो न कर्माणि न कर्तृत्वं न वासना ।
एष शुद्धचिदाकाशो विज्ञानघन आततः ॥ ४० ॥
प्राक्तनं वासनाजालं किंचिदस्य न विद्यते ।
केवलं व्योमरूपस्य भारूपस्येव तेजसः ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी परिस्थिति में अन्य की दृष्टि से अध्यस्त देह आदि से इसकी निर्विकल्पताकी क्षति नहीं
है, ऐसा जो हमने पहले कहा था, उसमें कुछ भी आंच नहीं आई, इस अभिप्राय से कहते हैं।
वही यह निर्विकल्प ब्राह्मण सृष्टि के आदि में निर्विकल्प चिदाकाशरूप अपने स्वरूप का
अवलम्बन कर आकाश में स्थित है । इसका न तो शरीर है, न कर्म है, न इसमें कर्तृत्व है और
न वासना हे । यह शुद्ध चिदाकाश, विज्ञानघन और सर्वव्यापक है यह केवल आकाशरूप
ओर तेज से प्रकाशरूप-सा है । इसकी प्राक्तन वासनाएँ तनिक भी नहीं हे