Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, Verse 56
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, verse 56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
चिद्व्योमकेवलमनन्तमनादिमध्यं ब्रह्मेति भाति निजचित्तवशात्स्वयंभूः ।
आकारवानिव पुमानिव वस्तुतस्तु वन्ध्यातनूज इव तस्य तु नास्ति देहः ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
मन का स्वयम्भू के आकार में परिणाम वास्तविक नहीं है, किन्तु शुद्ध ब्रह्म ही अज्ञान से
उस प्रकार विवर्त को प्राप्त होता है, यह कहते है ।
आदि, मध्य ओर अन्त रहित चिदाकाशरूप अद्वितीय ब्रह्म ही अपने संकल्प के कारण
स्वयम्भू यों आकारवान्-सा तथा पुरुष-सा भासित होता है, वास्तवमें तो वन्ध्यापुत्र के समान
उसका शरीर नहीं है