Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, Verse 46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एवमेतन्मया राम ब्रह्मैष कथितस्तव ।
विवादमकरोन्मृत्युर्यमेनैतत्कृते पुरा ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाशज ब्राह्मण इस दूसरे नाम से उक्त ब्रह्मा ही इस आख्यायिका से दर्शाया गया है
और जगत् मिथ्या है-ये दोनों बातें मैंने जान लीं, इसकी सूचना द्वारा युरु को प्रसन्न कर रहे
श्रीरामचन्द्रजी बोले :
भगवन्, आपने मुझसे आकाशज ब्राह्मण के नाम से स्वयम्भू, अज, एकात्मा,
जीवसमष्टिरूप ब्रह्मा ही कहा, ऐसी मेरी धारणा हे ॥४ ५॥ श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्र,
आपका कथन सत्य है, मैंने आपसे आकाशज विप्र के नाम से ब्रह्मा का ही कथन किया है।
प्राचीन समय में इन्हीं के लिए मृत्युने यम के साथ संवाद किया था। मन्वन्तरमें जब कि सम्पूर्ण
प्राणियों का संहार कर रहा सर्वभक्षी मृत्यु बलवान् हुआ तब उसने स्वयं ब्रह्माजी पर आक्रमण
करने का उद्योग किया । उसी समय धर्मराज यम ने मृत्यु को शिक्षा दी