Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इदमाकाशजाख्यानं श्रृणु श्रवणभूषणम् ।
उत्पत्त्याख्यं प्रकरणं येन राघव बुध्यसे ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
पहला सर्गे समाप्त
दूसरा सर्ग॑
भौतिक देह को आत्मा समझनेवाला अज्ञानी मृत्यु का भोजन है,
तत्त्वज्ञानी नहीं वह तो आकाशज द्विज की नाई चिन्मात्रस्वरूप ही है, इसका कथन ।
काम ओर कर्म की वासना से पूर्ण अविद्योपहित आत्मा ही जगत् का बीज और मृत्यु का
कारण हे, विद्या द्वारा अविद्या का विनाश होने पर मृत्यु के वश नहीं होता, इस पूर्वोक्त अर्थ में
विशेष दिखलाने के लिए जगत् के आदि स्रष्टा के स्वरूप के परिशोधन द्वारा आगे कहे जानेवाले
उपदेश की उपोद्घातरूप आख्यायिका को कहनेवाले वसिष्ठजी बोले : हे राघव, इस आकाशज
(८) विप्र के आख्यान को सुनिए जो कानों को विभूषित करनेवाला है और जिससे उत्पत्ति
प्रकरण का आपको बहुत सरलता से बोध हो जायेगा