Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, Verses 22–23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
नैतदस्यावशं चित्तमभावात्पूर्वकर्मणाम् ।
अद्य तावदनेनाद्यं न किंचित्कर्म संचितम् ॥ २२ ॥
एवमाकाशकोशात्मा विशदाकाशरूपिणि ।
स्वकारणे स्थितो नित्यः कारणानि न कानिचित् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शंका हो कि कायिक कर्म भले ही न हों, पर मानसिक कर्म तो उसके होंगे ही ? इस
पर कहते हैं।
पूर्व कर्मों के अभाव से इसका चित्त अवश नहीं है, आज तक इसने मारण में मृत्यु के
सहायक किसी मानस कर्म का संचय नहीं किया है। मन का व्यापार पूर्वदेह की व्यापारवासना
के अधीन है