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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, Verses 27–34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, verses 27–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 27-31

संस्कृत श्लोक

तथैव परमार्थात्सखात्मभूतः स्थितो द्विजः । यथा द्रवत्वं पयसि शून्यत्वं च यथाम्बरे ॥ २७ ॥ स्पन्दत्वं च यथा वायोस्तथैष परमे पदे । कर्माण्यद्यतनान्यस्य संचितानि न सन्ति हि ॥ २८ ॥ न पूर्वाण्येष तेनेह न संसारवशं गतः । सहकारिकारणानामभावे यः प्रजायते ॥ २९ ॥ नासौ स्वकारणाद्भिन्नो भवतीत्यनुभूयते । कारणानामभावेन तस्मादेष स्वयंभवः ॥ ३० ॥ कर्ता न पूर्वं नाप्यद्य कथमाक्रम्यते वद । यदैष कल्पनां बुद्ध्या मृतिनाम्नीं करिष्यति ॥ ३१ ॥ पृथ्व्यादिमानयमहमिति यस्य च निश्चयः । स पार्थिवो भवत्याशु ग्रहीतुं स च शक्यते ॥ ३२ ॥ पृथ्व्यादिकलनाभावादेष विप्रो न रूपवान् । दृढरज्ज्वेव गगनं ग्रहीतुं नैव युज्यते ॥ ३३ ॥ मृत्युरुवाच । भगवञ्जायते शून्यात्कथं नाम वदेति मे । पृथ्व्यादयः कथं सन्ति न सन्ति वद वा कथम् ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे जल में द्रवत्व (तरलता) है, जैसे आकाश में शून्यता है और जैसे वायुमें स्पन्दता (गति) है, वैसे ही परमार्थरूपसे आकाशभूत यह विप्र परमपदमें स्थित है । इसके न आधुनिक कर्म हैं, न संचित कर्म हैं और न प्राक्तन कर्म हैं, इसलिए यहाँ पर यह संसारका वशीभूत नहीं है । सहकारी कारणों का अभाव होने पर जो उत्पन्न होता है, वह अपने कारण से भिन्न नहीं होता, ऐसा अनुभव है । कारण न होने के कारण यह स्वयम्भू है। हे मृत्यो, न तो इसने पहले कर्म किये थे और न यह आज कर्म करता है, भला बताओ तो सही यह तुमसे कैसे आक्रान्त होगा २