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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 115

एक सौ चौढहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ पन्द्रहवाँ सर्ग श्रीरामचन्द्रजी का बोध से आश्चर्य वर्णन, माया ओर उसके नाश की स्थिति, राजा लवण की आपत्ति के कारण का निरुपण |

23 verse-groups

  1. Verses 1–3श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : भगवन्‌, महात्मा श्रीवसिष्ठजी के ऐसा कहने पर कमल की पंखुड़ी के समा…
  2. Verse 4श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : मुनिवर, जो अविद्या है ही नहीं, उसने सब लोगों को वश में कर लिया,…
  3. Verse 5जो अविद्या से तीनों जगतो में असद्‌ ही सत्य की तरह स्थित है, यह तो तृणमात्र तीनों जगता मेँ…
  4. Verse 6त्रिभुवन रूप आँगन में स्थित इस संसारमायारूप नदी का स्वरूप मेरे ज्ञान के लिए फिर कहिए
  5. Verse 7हे महात्मन्‌, और दूसरा यह सन्देह, जो मेरे हृदय में बैठा है, वह यह है कि वह महाभाग राजा लव…
  6. Verse 8हे ब्रह्मन्‌, ओर तीसरा प्रश्न यह है कि काठ ओर लोह के समान परस्पर संयुक्त, मल्ल और मेष के…
  7. Verse 9चौथा सन्देह यह है कि राजा लवण को उस प्रकार की बड़ी भारी आपत्ति देकर चंचल कार्य करनेवाला व…
  8. Verse 10इस प्रकार पूछे गये श्रीवसिष्ठजी विवेक की दढता मे प्रकृष्ट हेतु होने का कारण पहले तृतीय प्…
  9. Verse 11शंका : चित्त भी तो जड़ है, अतः वह भोक्ता कैसे? समाधान : चिदाभास के तादात्म्य को प्राप्त ह…
  10. Verse 12वही जीव है, ऐसा कहते हैं। नाना प्रकार के शरीरों को धारण करनेवाला कर्मफल का भागी जो यह देह…
  11. Verse 13हे राघव, अप्रबुद्ध जीव के ये अनन्त सुख-दुःख होते हैं ओर प्रबुद्ध के नहीं होते । शरीर के भ…
  12. Verses 14–16अज्ञानी मन, जिसने नाना प्रकार की संज्ञाओं से अनेक कल्पनाएँ कर रक्खी हैं, अनेक प्रकार की व…
  13. Verses 17–19जैसे दिन के प्रकाश से विकसित होने वाले कमल के मध्यका अन्धकार नष्ट हो जाता हे, वैसे ही प्र…
  14. Verses 20–22जैसे रेशम का कीड़ा रेशम के कोश से बन्धन को प्राप्त होता हे, वैसे ही जीव भी अविवेक रूपी दो…
  15. Verse 23हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे घर में घर का मालिक अनेक प्रकार की क्रियाँ करता है, किन्तु घर कुछ…
  16. Verse 24सब सुखदुःखं में और सब कल्पनाओं मेँ मन ही कर्ता है ओर मन ही भोक्ता हे । मन को आप जीव जानिये
  17. Verses 25–26यह राजा लवण मन के भ्रम से जिस प्रकार चाण्डलता को प्राप्त हुआ, इस उत्तम वृत्तान्त को मैं आ…
  18. Verses 27–30हे निष्पाप श्रीरामचन्द्रजी, प्राचीन काल में हरिश्चन्द्र के कुल में उत्पन्न राजा लवण ने एक…
  19. Verse 31अपने उपवन के भीतर मन से अपनी इच्छा के अनुसार यज्ञ कर रहे राजा का देवता, ऋषि और ब्राह्मणों…
  20. Verse 32ब्राह्मण आदि प्राणियों को सर्वस्व दक्षिणा देकर राजा अपने ही उपवन में दिन के अन्त में जाग…
  21. Verse 33इस प्रकार राजा लवण ने सन्तुष्ट मन से ही राजसूययज्ञ किया, इसलिए उसी को यज्ञ का फल होना उचि…
  22. Verse 34इससे सिद्ध हुआ कि चित्त को ही सुख-दुःख का भोक्ता पुरुष जानिये, इसलिए मन के शोधनरूप सत्य उ…
  23. Verses 35–36इस प्रकार रामचन्द्रजी के प्रश्न का समाधान कर देवता आदि सदस्यो के प्रति विस्तार से वर्णित…