Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 115 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
अतश्चित्तं नरं विद्धि भोक्तारं सुखदुःखयोः ।
तन्मनः पावनोपाये सत्ये योजय राघव ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
इससे सिद्ध हुआ कि चित्त को ही सुख-दुःख का भोक्ता पुरुष जानिये, इसलिए
मन के शोधनरूप सत्य उपाय में मन को लगाइए । मन ही क्रियाशक्ति की प्रधानता से
कर्ता, करण और क्रिया है । वह क्रिया ही सुखदुःखरूप फल के रूप में परिणत होती हे ।
चिदाभास की व्याप्ति से उस फल का भोक्ता मन ही है इसलिए भोक्तृत्व कर्तृत्व का प्रवाह
ही मायारूपी महानदी का स्वरूप है । इस तरह प्रथम प्रश्न का विषय भी इस सन्दर्भ से
दिखलाया गया है, चतुर्थ प्रश्न के उत्तर का समाधान आगे के सर्ग में होगा