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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, Verses 27–30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, verses 27–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 115 · श्लोक 27-30

संस्कृत श्लोक

हरिश्चन्द्रकुलोत्थेन लवणेन पुरानघ । एकं तेनोपविष्टेन चिन्तितं मनसा चिरम् ॥ २७ ॥ पितामहो मे सुमहान्राजसूयस्य याजकः । अहं तस्य कुले जातस्तं यजे मनसा मखम् ॥ २८ ॥ इति संचिन्त्य मनसा कृत्वा संभारमादृतः । राजसूयस्य दीक्षायां प्रविवेश महीपतिः ॥ २९ ॥ ऋत्विजश्चाह्वयामास पूजयामास सन्मुनीन् । देवानामन्त्रयामास ज्वालयामास पावकम् ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

हे निष्पाप श्रीरामचन्द्रजी, प्राचीन काल में हरिश्चन्द्र के कुल में उत्पन्न राजा लवण ने एकान्त में बैठकर बहुत दिनों तक मन से विचार किया : मेरे पितामह बड़े महानुभाव थे । उन्होंने राजसूययज्ञ किया था । मैं उनके कुल में उत्पन्न हुआ हू । मैं मन से उस यज्ञ को करता हूँ, ऐसा मन से विचारकर आदरपूर्वक सब सामग्रियाँ इकट्ठी कर राजा ने राजसूययज्ञ की दीक्षा ली । उसने ऋत्विजों को बुलाया, श्रेष्ठ मुनियों की पूजा की, यज्ञ में आने के लिए देवताओं से प्रार्थना की और अग्नि प्रज्वलित की