Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 115 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
काष्ठकुड्योपमो देहो न किंचन इहानघ ।
स्वप्नालोक इवानेन चेतसा परिकल्प्यते ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार पूछे गये श्रीवसिष्ठजी विवेक की दढता मे प्रकृष्ट हेतु होने का कारण पहले
तृतीय प्रश्न का समाधान करते हुए अर्थतः प्रथम प्रश्न का भी समाधान करते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे निष्पाप रामचन्द्रजी, इस संसार में काष्ठ ओर भीतके समान
जड देह कुछ भी नहीं हे यानी वास्तविक नहीं हे । स्वप्न के प्रकाश की नाई इस चित्त ने कल्पना
कर रक्खी है । इससे यह निष्कर्ष निकला कि अचेतन होने से ओर असत् होने से शरीर
कर्मफल का भोक्ता नहीं हो सकता