Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 115 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
चेतस्तु जीवतां यातं चिच्छक्तिपरिभूषितम् ।
विद्यात्संसारसंरम्भं कपिपोतकचञ्चलम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
शंका : चित्त भी तो जड़ है, अतः वह भोक्ता कैसे?
समाधान : चिदाभास के तादात्म्य को प्राप्त हुए चित्त में जाङ्यरूप दोष नहीं रहता । उक्त
चित्त का भोक्तृत्व में आग्रह है और वह बन्दर के बच्चे के समान चंचल है