Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 115 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
देही हि कर्मभाग्यो हि नानाकारशरीरधृक् ।
अहंकारमनोजीवनामभिः परिकल्प्यते ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
वही जीव है, ऐसा कहते हैं।
नाना प्रकार के शरीरों को धारण करनेवाला कर्मफल का भागी जो यह देही है, वह
अहंकार, मन, जीव आदि पर्यायों से कहा जाता है