Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, Verses 17–19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, verses 17–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 115 · श्लोक 17-19
संस्कृत श्लोक
संप्रबुद्धस्य मनसस्तमः सर्वं विलीयते ।
कमलस्य यथा हार्दं दिनालोकविकासिनः ॥ १७ ॥
चित्ताविद्यामनोजीववासनेति कृतात्मभिः ।
कर्मात्मेति च यः प्रोक्तः स देही दुःखकोविदः ॥ १८ ॥
जडो देहो न दुःखार्हो दुःखी देह्यविचारतः ।
अविचारो घनाज्ञानादज्ञानं दुःखकारणम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे दिन के प्रकाश से विकसित होने वाले
कमल के मध्यका अन्धकार नष्ट हो जाता हे, वैसे ही प्रबुद्ध हुए मन का सम्पूर्ण अन्धकार
विलीन हो जाता हे । चित्त अविद्या, मन, जीव, वासना, कमत्मा-इन नामों से विद्वानों द्वारा
जो कहा जाता है वह देही दुःख का भोक्ता हे । देह जड़ हे, अतएव देह दुःखभोग के योग्य
नहीं है जीव ही अविचारवश दुःखी होता है । अविचार सघन अज्ञान से होता है, इसलिए
सम्पूर्णं दुःखों का कारण अज्ञान हे