Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, Verses 20–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, verses 20–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 115 · श्लोक 20-22
संस्कृत श्लोक
शुभाशुभानां धर्माणां जीवो विषयतां गतः ।
अविवेकैकदोषेण कोशेनेव हि कीटकः ॥ २० ॥
अविवेकामयोन्नद्धं मनो विविधवृत्तिमत् ।
नानाकारविहारेण परिभ्रमति चक्रवत् ॥ २१ ॥
उदेति रौति हन्त्यत्ति याति वल्गति निन्दति ।
मन एव शरीरेऽस्मिन्न शरीरं कदाचन ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे रेशम का कीड़ा रेशम के कोश से
बन्धन को प्राप्त होता हे, वैसे ही जीव भी अविवेक रूपी दोष से शुभ ओर अशुभ धर्मो का
भाजन बना हे । अविवेकरूप रोग से बँधा हुआ, विविध वृत्तियों से युक्त मन अनेक आकारो
में विहार द्वारा चक्र के समान घूमता हे । इस शरीर मे मन ही उदय को प्राप्त होता है, रोता
है, मारता है, खाता है, जाता है, बोलता है ओर निन्दा करता है, शरीर कभी भी कुछ नहीं
करता है