Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, Verses 25–26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, verses 25–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 115 · श्लोक 25,26
संस्कृत श्लोक
अत्र ते श्रृणु वक्ष्यामि वृत्तान्तमिममुत्तमम् ।
लवणोऽसौ यथा यातश्चण्डालत्वं मनोभ्रमात् ॥ २५ ॥
मनः कर्मफलं भुङ्कते शुभं वाऽशुभमेव वा ।
यथैतद्बुद्ध्यसे नूनं तथाकर्णय राघव ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
यह राजा लवण मन के भ्रम
से जिस प्रकार चाण्डलता को प्राप्त हुआ, इस उत्तम वृत्तान्त को मैं आपसे कहूँगा, आप
सावधान होकर सुनिये । हे श्रीरामचन्द्रजी, मन ही शुभ अथवा अशुभ फलका भोग करता
है, इस बात को आप जिस प्रकार समझ जायेंगे वैसे मैं आपसे कहता हूँ, आप
सुनिये