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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, Verses 14–16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, verses 14–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 115 · श्लोक 14-16

संस्कृत श्लोक

अप्रबुद्धं मनो नानासंज्ञाकल्पितकल्पनम् । वृत्तीरनुपतच्चित्रा विचित्राकृतितां गतम् ॥ १४ ॥ अप्रबुद्धं मनो यावन्निद्रितं तावदेव हि । संभ्रमं पश्यति स्वप्ने न प्रबुद्धं कदाचन ॥ १५ ॥ अज्ञाननिद्राक्षुभितो जीवो यावन्न बोधितः । तावत्पश्यति दुर्भेदं संसारारम्भविभ्रमम् ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

अज्ञानी मन, जिसने नाना प्रकार की संज्ञाओं से अनेक कल्पनाएँ कर रक्खी हैं, अनेक प्रकार की वृत्तियों में प्रवेश करता हुआ विचित्र-विचित्र आकार को प्राप्त हुआ है । जब तक मन अज्ञ रहता है तभी तक निद्रित रहता है और स्वप्न में नाना प्रकार के भ्रमों को देखता है, लेकिन ज्ञानी मन कदापि इन विविध विभ्रमो को नहीं देखता । अज्ञाननिद्रा से पीडित हुआ जीव जब तक अज्ञानरूप निद्रा से जगाया नहीं जाता तब तक अभेद्य संसाररूप स्वप्न भ्रम को देखता हे