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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, Verses 1–3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, verses 1–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 115 · श्लोक 1-3

संस्कृत श्लोक

श्रीवाल्मीकिरुवाच । एवमुक्तो भगवता वसिष्ठेन महात्मना । रामः कमलपत्राक्ष उन्मीलित इवाबभौ ॥ १ ॥ विकासितान्तःकरणः शोभामलमुपाययौ । आश्वस्तस्तमसि क्षीणे पद्मोऽर्कालोकनादिव ॥ २ ॥ बोधविस्मयसंजातसौम्यस्मितसिताननः । दन्तरश्मिसुधाधौतामिमां वाचमुवाच ह ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : भगवन्‌, महात्मा श्रीवसिष्ठजी के ऐसा कहने पर कमल की पंखुड़ी के समान विशाल नेत्रवाले श्रीरामचन्द्रजी विकसित पद्म के समान सुशोभित हुए । जैसे अन्धकार के नष्ट होने पर सूर्य भगवान्‌ के दर्शन से कमल प्रसन्न होकर शोभा को प्राप्त होता है, वैसे ही समाधान से सन्तुष्ट हुए श्रीरामचन्द्रजी अज्ञान के नष्ट होने पर प्रफुल्लित अन्त-करणवाले होकर शोभा को प्राप्त हुए । बोध से उत्पन्न हुए आश्चर्य से मन्द-मन्द मुस्कुराहट से जिनका मुखकमल प्रकाशमान है, ऐसे श्रीरामचन्द्रजी ने दतो की किरणरूपी सुधा से धोई हुई यह वाणी कही

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ चौढहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ पन्द्रहवाँ सर्ग श्रीरामचन्द्रजी का बोध से आश्चर्य वर्णन, माया ओर उसके नाश की स्थिति, राजा लवण की आपत्ति के कारण का निरुपण |