Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 115 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
इदं तद्वज्रतां यातं तृणमात्रं जगत्त्रये ।
अविद्ययापि यन्नामासदेव सदिव स्थितम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
जो अविद्या से तीनों
जगतो में असद् ही सत्य की तरह स्थित है, यह तो तृणमात्र तीनों जगता मेँ व्रता को प्राप्त
हो गया