Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 115 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

संश्लिष्टयोराहतयोर्द्वयोर्वा देहदेहिनोः । ब्रह्मन्क इव संसारी शुभाशुभफलैकभाक् ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

हे ब्रह्मन्‌, ओर तीसरा प्रश्न यह है कि काठ ओर लोह के समान परस्पर संयुक्त, मल्ल और मेष के समान परस्पर के आघातों से आक्रान्त देह ओर देही हैं, इन दो में से कौन-सा शुभ और अशुभ फल का एकमात्र भाजन संसारी है ?