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Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker) · Sarga 9

आठवाँ सर्ग समाप्त नौवाँ सर्ग दैव के अपलाप की सिद्धि के लिए सफल कर्मो की मनोमात्रता और मन की चिदात्मताका वर्णन |

26 verse-groups

  1. Verse 1पुरुषप्रयत्न की स्वतन्त्रता को सिद्ध करने के लिए पहले कहीं पर "दैव असत्‌ है” ऐसा कहा और क…
  2. Verse 2रामचन्द्रजी के पूछने पर उनके अभिप्राय को जानकर श्रीवसिष्ठजी भी दैव का अपलाप करनेवाली युक्…
  3. Verse 3ऐसा बोधन करने के लिए करणभूत पुरुषप्रयत्न मे फलकर्तृत्वका कथन किया गया है, यह तात्पर्य है…
  4. Verses 4–5निरालम्बत्वरूप अनुपपत्तिका परिहार करते हैं। फल को अवश्य देनेवाले पुरुषप्रयत्न से सिद्ध वन…
  5. Verse 6श्रीवसिष्टजी वावाकि मत का प्रदर्शन करते है। पुरुषप्रयत्न से होनेवाला जो अवश्य फल का भोग ह…
  6. Verses 7–10अब महामुनि वक्निष्ठजी सिद्धान्त बतलाते हैं । हे रामचन्द्रजी, किसी पुरुष का कोई देव ही भ्र…
  7. Verse 11दोनो कल्पो के अभेद का कथन करने से आशय को न जान रहे एवं प्रथम कल्प का उपक्रमकर द्वितीय कल्…
  8. Verses 12–16श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रामचन्द्र, ठीक है, आप उन दोनों कल्पो के विरोध को जानते हैँ, सुनि…
  9. Verse 17कर्मकर्ताओं के सभी कर्म इरी प्रकार होते हें । अपनी प्रबल वासना ही कर्म है और वासना भी अपन…
  10. Verse 18क्योकि “वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृक्तिकेत्येव सत्यम्‌” (विकार और नाम केवल वाचारम्भणमात्…
  11. Verse 19श्राणन्नेव प्राणो नाम भवति वदन्‌ वाक, पश्यँश्रक्षु: श्रण्वन्‌ ओत्रं मन्‍वानो मनः “ इस श्र…
  12. Verses 20–22यदि मन अत्यन्त असत्‌ है, तो उससे व्यवहार की सिद्धि कैसे होगी ? अत्यन्त असरत्‌ वन्ध्यायुत्…
  13. Verse 23श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : मुनिवर, पूर्वजन्म की वासनाएँ जैसे मुझे कार्य में लगाती हैं, वैसे…
  14. Verse 24इस समय प्राप्त हो रहे फल में भले ही तुम्हारी स्वतन्त्रता न हो, पर भावी फल के अनुकूल यत्न…
  15. Verse 25उक्त अर्थ का ही समर्थन करने के लिए वासनाओं का भेद दर्शा कर कहते हैं। पूर्वजन्म की वासनाएँ…
  16. Verse 26प्रथम पक्ष में कहते हैं । यदि आपकी पूर्वजन्म की वासनाएँ शुभ हों, तो पूर्वजन्म की शुभ वासन…
  17. Verse 27दूसरे पक्ष में कहते हैं । यदि आपकी पूर्वजन्म की वासनाएँ अशुभ हैं और वे आपको संकट की ओर ले…
  18. Verse 28“यो मनसि तिष्ठन्मनोऽन्तरो यं मनो न वेद” इस श्रुति से मन को प्रेरित करनेवाला प्रज्ञानामक आ…
  19. Verse 29चेतनरूप आपको कोड दूसरा चेतन प्रकाशित करता है, ऐसा यदि मानो, तो उसको भी दूसरा चेतन प्रकाशि…
  20. Verses 30–31पुरुष की स्वतन्त्रता के साधन का फल कहते हैं। सन्मार्ग ओर असन्मार्ग से बह रही वासनारूपी नद…
  21. Verse 32चित्तरूपी नदी दो प्रकार से बहती है पाप के लिए और पुण्य के लिए उन दो ग्रोतों में से एक का…
  22. Verse 33इस प्रकार पूर्वोक्त क्रम से चित्तरूपी बालक को शीघ्र रागादि दोषों के विश्लेषण से और स्वाभा…
  23. Verses 34–36शीघ्र हठपूर्वक उसका निरोध न करें, ऐसा करने से उद्वेग से समाधि के टूटने का भय रहता है। भगव…
  24. Verses 37–38वासनाओं के अभ्यास की विफलता की शंका नहीं करनी चाहिए, क्योकि पूर्ववासना ओं के अभ्यास का फल…
  25. Verses 39–40वस्तुतः तो इस विषय में सन्देह का अवसर ही नहीं है, क्योकि अन्य स्थलों से भी अभ्यास में अभ्…
  26. Verses 41–43कितने समय तक शुभ वासना का अभ्यास करना चाहिए ? भद्र जब तक गुरु के उपदेश, शास्त्राभ्यास और…